पिड़ावा। नगर के वार्ड नंबर 13 सहित समूचे बाजार क्षेत्र में आवारा सांडों और पशुओं की लड़ाई ने आतंक का रूप ले लिया है। आज दोपहर लगभग 12:05 बजे वार्ड नंबर 13, मोहल्ला चौधरियान में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब दो आवारा सांड आपस में भिड़ गए। मंजर इतना खौफनाक था कि आसपास मौजूद बच्चे, औरतें और बुजुर्ग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। सांडों की इस भिड़ंत ने पूरे मोहल्ले में दहशत का माहौल पैदा कर दिया।

साक्षी बने नागरिक, डरा हुआ है बचपन:
घटना के समय मौके पर मौजूद नागरिक मंच के बाबू सिंह कमाल, राजेन्द्र कुमार जैन, प्रेम सिंह, पारस और हरिसिंह जैन सहित अन्य प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं है। पिड़ावा की हर गली और चौराहे पर आए दिन सांडों और गायों का जमावड़ा लगा रहता है। इस मोहल्ले के पास ही तीन बड़े स्कूल स्थित हैं, जहाँ से छोटे-छोटे छात्र-छात्राएं दिनभर गुजरते हैं। किसी भी समय सांडों की लड़ाई इन मासूमों की जान ले सकती है, लेकिन स्थानीय प्रशासन इस ओर से पूरी तरह आँखें मूँदे बैठा है।
जिस वक्त वहाँ से हनुमान जयंती का जुलूस निकाला जा रहा था। जुलूस से थोड़ी ही दूर ये सांड आपस मे लड़ रहे थे। गनीमत रही कि मौके पर तैनात पुलिस प्रशासन के जाप्ते ने तत्परता दिखाते हुए इन लड़ते हुए सांडों को कड़ी मशक्कत के बाद अलग किया।
यदि पुलिस बल समय रहते इन सांडों को खदेड़ कर अलग नहीं करता, तो ये लड़ते-लड़ते सीधे जुलूस की भीड़ में घुस सकते थे, जिससे बड़ी जनहानि और भगदड़ मच सकती थी।
सांडों के हमले में जा चुकी है जान, वाहनों का भी नुकसान:
पिड़ावा वासी आवारा पशुओं के इस आतंक से केवल डरे हुए नहीं हैं, बल्कि इसका घाव भी झेल रहे हैं। वर्तमान समय मे इन आवारा सांडों की चपेट में आने से कई लोग लहूलुहान हो चुके हैं। यहाँ तक कि एक बुजुर्ग को तो सांड ने उछाल कर मौत के घाट उतार दिया है। इसके बावजूद प्रशासन की संवेदनहीनता चरम पर है। बाजारों में खड़े वाहनों को भी ये पशु आए दिन क्षतिग्रस्त कर रहे हैं, जिससे व्यापारियों और आमजन को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
प्रशासन की कुंभकर्णी नींद और जनता का रोष:
नगर वासियों का कहना है कि प्रशासन पूरी तरह कुंभकर्णी नींद सो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि नगर पालिका और स्थानीय प्रशासन को शायद किसी और बड़े हादसे की उम्मीद है, जिसके बाद ही उनकी नींद खुलेगी। क्या एक बुजुर्ग की मौत और कई लोगों का घायल होना काफी नहीं है? नागरिक मंच ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने इन आवारा सांडों को शहर से बाहर करने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की, तो जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
Pirawa Times विशेष: ‘मौत’ के बीच जीने को मजबूर पिड़ावा!
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प्रशासनिक विफलता: नगर पालिका के पास आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए न तो संसाधन हैं और न ही नीयत। आखिर क्यों जनता के टैक्स का पैसा इन समस्याओं के समाधान में खर्च नहीं होता?
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स्कूल जाने वाले बच्चों का क्या? वार्ड 13 के आसपास तीन स्कूल होना इस समस्या को ‘इमरजेंसी’ की श्रेणी में खड़ा करता है। क्या प्रशासन तब जागेगा जब कोई मासूम सांडों के पैरों तले कुचला जाएगा?
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तीखा सवाल: एक बुजुर्ग की जान जा चुकी है, वाहनों का नुकसान हो रहा है, फिर भी ‘कुंभकर्णी नींद’ क्यों? क्या अधिकारियों के परिवार इन सड़कों पर नहीं चलते?
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अल्टीमेटम: पिड़ावा टाइम्स प्रशासन से सीधा सवाल पूछता है—अगली मौत का जिम्मेदार कौन होगा?







