रायपुर। तहसील और उसके आसपास के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों ‘सफेद सोना’ कही जाने वाली लहसुन की फसल की खुदाई का काम अपने पूरे परवान पर है। खेतों में सुबह की पहली किरण से लेकर शाम ढलने तक किसान परिवार, मजदूरों के साथ मिलकर मिट्टी से अपनी साल भर की मेहनत निकालने में जुटे हुए हैं। लेकिन इस बार खुशहाली की चमक थोड़ी फीकी नजर आ रही है। एक तरफ जहाँ फसल पककर तैयार है, वहीं दूसरी ओर कुदरत की बेरुखी और अज्ञात बीमारियों के प्रकोप ने लहसुन की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
खेतों में पसीना बहाता अन्नदाता:
रायपुर क्षेत्र के गाँवों में इन दिनों खेती-बाड़ी का परिदृश्य पूरी तरह बदला हुआ है। किसान इस उम्मीद में अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं कि शायद इस साल उनकी किस्मत का ताला खुल जाए। पिछले वर्ष की कड़वी यादें अब भी किसानों के जेहन में ताजा हैं, जब लहसुन के दाम इतने गिर गए थे कि कई किसानों को अपनी लागत निकालना भी दूभर हो गया था। उस आर्थिक चोट से उबरने के लिए इस साल किसानों ने भारी कर्ज लेकर और महंगी खाद-बीज डालकर लहसुन की बुवाई की थी।
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बीमार फसल ने बिगाड़ा उत्पादन का गणित:
इस वर्ष की सबसे बड़ी चुनौती लहसुन की फसल पर लगा अज्ञात ‘रोग’ (बीमारी) रहा है। किसानों के अनुसार, फसल की बढ़त के समय ही पत्तों के पीला पड़ने और कंद के छोटे रह जाने की समस्या देखी गई। कई कीटनाशकों के छिड़काव के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ, जिसका सीधा असर अब उत्पादन पर दिख रहा है। प्रति बीघा निकलने वाला लहसुन का औसत इस बार काफी कम है, जिससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। उत्पादन कम होने का मतलब है कि अब किसानों की पूरी उम्मीद केवल बाज़ार के ‘अच्छे भाव’ पर टिकी है।
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बाजार और सरकार से आस:
वर्तमान में मंडियों में लहसुन की आवक शुरू होने वाली है। किसानों का कहना है कि अगर इस बार लहसुन के दाम 5000 से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल के बीच स्थिर रहते हैं, तभी उनकी लागत और मेहनत वसूल हो पाएगी। रायपुर के किसानों ने राज्य सरकार और कृषि विभाग से पुरजोर मांग की है कि लहसुन का उचित समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाए और लहसुन की खरीद के लिए सुचारू व्यवस्था की जाए ताकि बिचौलिये उनका शोषण न कर सकें।
Pirawa Times विशेष: सफेद सोना या सफेद हाथी?
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लागत का बोझ: खाद, बीज, कीटनाशक और अब खुदाई के लिए मजदूरी—लहसुन की खेती अब आम किसान के बस से बाहर होती जा रही है। क्या सरकार को इन बढ़ती लागतों पर सब्सिडी नहीं देनी चाहिए?
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बीमारी का रहस्य: आखिर वह कौन सा रोग है जिसने रायपुर के लहसुन को अपनी चपेट में लिया? क्या कृषि विभाग के अधिकारियों ने खेतों का दौरा किया? या किसान केवल भगवान भरोसे ही खेती कर रहे हैं?
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भाव की अनिश्चितता: पिछले साल की बर्बादी के बाद इस साल का भाव किसानों का भविष्य तय करेगा। यदि भाव कम रहे, तो क्षेत्र में कृषि संकट गहरा सकता है, जिससे किसान साहूकारों के कर्ज के जाल में और फंस जाएंगे।
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तीखा सवाल: क्या केवल ‘उम्मीद’ के दम पर किसान कब तक जुआ खेलता रहेगा? क्या सरकार लहसुन के लिए कोई ठोस बीमा योजना या भाव स्थिरीकरण कोष (Price Stabilization Fund) बनाने का साहस दिखाएगी?

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