भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ी जनता की गाढ़ी कमाई !
पिड़ावा। नगर पालिका क्षेत्र में केंद्र सरकार के स्वच्छता मिशन को पलीता लगाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। तहसील कार्यालय और बाईपास मार्ग जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर बनाए गए अत्याधुनिक शौचालय देखरेख के अभाव में अब खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। जिन शौचालयों को शहर की सुंदरता और सुविधा बढ़ाना था, वे आज भ्रष्टाचार और नगर पालिका की घोर लापरवाही का जीवंत प्रमाण बन चुके हैं।
अत्याधुनिक’ शौचालयों पर उद्घाटन पट्टीदेखरेख नहीं होने के कारण यहाँ लगी महंगी वेस्टर्न सीटें (Western Seats) टूट चुकी हैंलाखों रुपये खर्च करने के बाद भी इन शौचालयों पर ताला लटका रहता है
लाखों का बजट, शून्य सुविधा: कागजों में ‘अत्याधुनिक’, जमीन पर ‘बदहाल’
नगर पालिका द्वारा वर्ष 2018 में उपखंड कार्यालय के सामने और बाईपास स्थित नई सब्जी मंडी के पास 30-30 लाख रुपये (कुल 60 लाख) की भारी-भरकम लागत से दो अत्याधुनिक शौचालयों का निर्माण शुरू करवाया गया था।
नाम बड़े और दर्शन छोटे: इन शौचालयों को ‘अत्याधुनिक’ नाम दिया गया था, लेकिन वर्तमान में इनकी स्थिति साधारण शौचालयों से भी बदतर हो चुकी है।
बर्बादी का मंजर: देखरेख नहीं होने के कारण यहाँ लगी महंगी वेस्टर्न सीटें (Western Seats) टूट चुकी हैं, बिजली के बोर्ड उखड़ रहे हैं और पानी के लिए लगाई गई ट्यूबवेल भी खराब पड़ी है।
ताले में बंद जनता का पैसा: खंडहर बन रही करोड़ों की बिल्डिंगें
हैरानी की बात यह है कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी इन शौचालयों पर ताला लटका रहता है, जिससे राहगीरों और आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा।
अंधेरी गलियां: रात के समय इन बंद इमारतों के आसपास असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है।
प्रशासनिक मौन: नगर पालिका प्रशासन की इस बेरुखी के कारण केवल ये शौचालय ही नहीं, बल्कि शहर की कई अन्य सरकारी बिल्डिंगें भी अनदेखी का शिकार होकर चीख-चीखकर अपनी दुर्दशा बयां कर रही हैं।
अत्याधुनिक शौचालयों की बदहालीअत्याधुनिक शौचालयों की बदहाली
जनता पूछे सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?
स्थानीय नागरिकों में इस बर्बादी को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जब सरकार इतना बजट देती है, तो उसका उपयोग जनता के लिए क्यों नहीं किया जा रहा? क्या अधिकारियों की मिलीभगत से जानबूझकर इन संपत्तियों को बर्बाद किया जा रहा है?
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सरकारी लूट: 60 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी यदि शौचालय चालू नहीं हैं, तो यह सीधे तौर पर सरकारी धन की लूट है।
स्वच्छता मिशन पर दाग: ऐसे प्रोजेक्ट्स से केंद्र सरकार के स्वच्छता अभियान की छवि धूमिल हो रही है।
जवाबदेही तय हो: नगर पालिका के उन अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी निगरानी में ये संपत्तियां कबाड़ में तब्दील हो रही हैं।
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