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पिड़ावा में आरएसएस का शंखनाद: “हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा!” संघ शताब्दी वर्ष पर प्रबुद्ध जन गोष्ठी संपन्न

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पिड़ावा में आरएसएस का शंखनाद: “हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा!
“हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा!” संघ शताब्दी वर्ष पर प्रबुद्ध जन गोष्ठी संपन्न
पिड़ावा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के पावन उपलक्ष्य में आज पिड़ावा नगर के 56 दरवाजा स्थित राधा कृष्ण माली समाज धर्मशाला में एक ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ का आयोजन किया गया। “हिन्दुत्व, भारत की आत्मा है” के मूल विचार पर केंद्रित इस संगोष्ठी में नगर के प्रबुद्धजनों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत मंचासीन अतिथियों द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।

पतन से उत्थान की यात्रा: मुख्य वक्ता का ओजस्वी पाथेय
गोष्ठी के मुख्य वक्ता, संघ के विभाग सद्भावना प्रमुख सूरज मल ने अपने संबोधन में समाज के ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “आचरण में धर्म को त्यागने, सांस्कृतिक आत्महीनता और स्वार्थ केंद्रित लालसा के कारण ही हमारा समाज कभी पतन और पराधीनता की ओर अग्रसर हुआ था। इसी राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण के लिए पूज्य डॉ. हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना की और शाखा पद्धति के माध्यम से व्यक्ति निर्माण का कार्य शुरू किया।” उन्होंने पूजनीय गुरुजी के योगदान को याद करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने संघ के वैचारिक अधिष्ठान को पुष्ट कर कार्यकर्ताओं को प्रेरक नेतृत्व प्रदान किया।
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राष्ट्रीय आंदोलनों और सेवा कार्यों में संघ की भूमिका:
सूरज मल ने आपातकाल के संघर्ष से लेकर श्री राम जन्मभूमि आंदोलन और स्वदेशी भाव के जागरण तक, संघ के राष्ट्रव्यापी कार्यों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संघ केवल शाखा तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के सहयोग से एक लाख से अधिक सेवा कार्य और एकल विद्यालय जैसे प्रकल्पों के माध्यम से समाज के अंतिम छोर तक समाधान पहुँचाने का कार्य कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “समाज को संगठित करना ही संघ का मुख्य कार्य है और हमें अपने जीवन से श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे।”
विविधता में एकता नहीं, एकता में विविधता:
भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण दार्शनिक बिंदु रखा। उन्होंने कहा, “अक्सर कहा जाता है कि भारत में विविधता में एकता है, लेकिन वास्तव में यहाँ ‘एकता में विविधता’ है। एक ही तत्व की अभिव्यक्ति विविध रूपों में हुई है।” उन्होंने वर्ष प्रतिपदा, चातुर्मास और मकर संक्रांति जैसे पर्वों को सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक बताया।
हिन्दुत्व और पंच परिवर्तन का संकल्प:
हिन्दुत्व पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शैव, शाक्त, वैष्णव, कबीरपंथी, जैन, सिख और बौद्ध—ये सभी मत-पंथ हिन्दुत्व के अभिन्न घटक हैं क्योंकि ये सभी सत्य, करुणा, शुचिता और तपस जैसे “धर्म मूल्यों” में विश्वास रखते हैं। उन्होंने आने वाले समय के लिए ‘पंच परिवर्तन’ का मंत्र दिया, जिसमें:
  1. सामाजिक समरसता
  2. कुटुंब प्रबोधन (परिवारों में संस्कारों का बीजारोपण)
  3. नागरिक कर्तव्य
  4. स्वबोध
  5. पर्यावरण संरक्षण शामिल हैं।
​उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों की गौरवशाली कहानियाँ सुनाना आवश्यक है ताकि उनमें राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना जागृत हो सके।
मंचासीन अतिथि और उपस्थिति:
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने सिंह ने संघ की रचनात्मक भूमिका की सराहना की। मंच पर विष्णु पाटीदार (खंड संघचालक) भी उपस्थिति रहे। कार्यक्रम में पिड़ावा के प्रबुद्ध नागरिक, विभिन्न व्यवसायों से जुड़े प्रतिनिधि और स्वयंसेवक उपस्थित रहे, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में अपनी आहुति देने का संकल्प लिया।
Pirawa Times विशेष: वैचारिक क्रांति का केंद्र बना पिड़ावा!
  • शताब्दी वर्ष का महत्व: 1925 में स्थापित संघ अब अपने 100 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है। पिड़ावा में इस गोष्ठी का आयोजन यह दर्शाता है कि नगर के प्रबुद्ध जन राष्ट्र की वैचारिक धारा से मजबूती से जुड़े हैं।
  • कुटुंब प्रबोधन की प्रासंगिकता: आज के डिजिटल युग में जहाँ परिवार टूट रहे हैं, संघ का कुटुंब प्रबोधन पर जोर देना समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।
  • समरसता का संदेश: माली समाज धर्मशाला में आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि राष्ट्र कार्य के लिए हर समाज और हर वर्ग एक सूत्र में बंधा है।
  • युवाओं को दिशा: लाचित बरफुकन और श्रीमंत शंकरदेव जैसे महापुरुषों का उल्लेख कर युवाओं को क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद की प्रेरणा दी गई।
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