जनता ने दिए अलग-अलग जनादेश, पार्षदों के फैसले ने बदल दिया पूरा गणित… सबसे बड़ा सवाल—भाजपा और AAP के बीच आखिर कैसे बनी सहमति?
टिप्पणी
नगर पालिका का चुनाव खत्म हो चुका है, लेकिन इसके बाद बना सियासी समीकरण अब शहर की सबसे बड़ी चर्चा बन गया है। वार्ड चुनाव में भाजपा और आम आदमी पार्टी अलग-अलग राजनीतिक विकल्प के रूप में मैदान में थीं, लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव में दोनों के पार्षद एक ही तरफ नजर आए। यही घटनाक्रम अब पिड़ावा की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
20 वार्डों वाली पिड़ावा नगर पालिका में चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस 8 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल, भाजपा 6, आप 5 और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई। बहुमत के लिए 11 पार्षदों की जरूरत थी, यानी किसी भी दल के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था।
यहीं से शुरू हुआ असली सियासी गणित, 6, 1 और 5 का जोड़ बना 12 का आंकड़ा
अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा के राजू माली को 12 वोट मिले और वे अध्यक्ष निर्वाचित हुए। कांग्रेस के रणजीत सिंह चौहान को 8 वोट मिले। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार भाजपा के 6 पार्षदों के साथ आप के 5 पार्षद और एक निर्दलीय पार्षद का समर्थन भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गया।
यानी जिस सदन में चुनाव के बाद भाजपा के पास 6 और आप के पास 5 पार्षद थे, वही 6+5+1 का आंकड़ा अध्यक्ष चुनाव में 11 का बहुमत पार करते हुए 12 तक पहुंच गया।
और यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है।
चुनाव में अलग पहचान… फिर साथ आने का आधार क्या रहा?
मतदाता जब वोट डालने गया था, उसके सामने कांग्रेस, भाजपा,आप और निर्दलीय—अलग-अलग विकल्प थे। लेकिन अध्यक्ष चुनाव के समय भाजपा और आप के पार्षद एक ही पक्ष में मतदान करते दिखाई दिए।
यह सवाल किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए है—आखिर भाजपा और आप के बीच यह सहमति किस आधार पर बनी?






