पिड़ावा। लोकतंत्र की इससे बदनसीब और घिनौनी तस्वीर कोई दूसरी नहीं हो सकती, जहाँ राजशाही ठाठ-बाठ आज भी सरकारी दफ्तरों के भीतर पैर पसारे बैठी है। पिड़ावा उपखंड का सबसे महत्वपूर्ण इलाका कहा जाने वाला तहसील परिसर आज आम जनता, विशेषकर अन्नदाता किसानों के आत्मसम्मान की सरेआम बलि ले रहा है। इस भीषण गर्मी में जब दूर-दराज के गाँवों से कोई गरीब किसान या ग्रामीण महिला अपने हक का काम करवाने इस दफ्तर की चौखट पर पैर रखती है, तो सिस्टम उसे एक अदद शौचालय तक नसीब नहीं होने देता। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए—जिस परिसर में कानून के रखवाले बैठते हैं, उसी परिसर में महिलाओं को अपनी लाज बचाने के लिए सूनसान झाड़ियों की ओट तलाशनी पड़ रही है।

साहब के टॉयलेट में खुशबू, जनता के हिस्से में बदबू और ताले!
धरातल की पड़ताल में जो सच सामने आया है, वह पिड़ावा प्रशासन को फर्श पर लाने के लिए काफी है। तहसील के भीतर कुर्सियों पर बैठकर फाइलें सरकाने वाले आला अफसरों के लिए तो हर सुविधा से लैस, शौचालय चालू हैं। लेकिन, जैसे ही आप आम जनता के लिए बनाए गए कथित टॉयलेट की तरफ बढ़ेंगे, आपकी आँखें शर्म से झुक जाएंगी। लोहे के सड़े-गले दरवाजों पर ताले लटके हैं। दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है और छतें टूट रही हैं। पास में बना दूसरा ढांचा बिना दरवाजे के खुला पड़ा है, जो शौचालय कम और नरक का दरवाजा ज़्यादा नजर आता है।

बड़ा खुलासा: “शौचालय जाने की हालत में ही नहीं, इसलिए जड़ा ताला”— तहसीलदार का गैर-जिम्मेदाराना बयान!
तहसील परिसर में मूलभूत सुविधाओं के अभाव और विशेषकर महिलाओं के लिए बंद पड़े शौचालयों के गंभीर मामले को लेकर जब पिड़ावा टाइम्स ने सीधे तहसीलदार सतीश चंद पाटीदार से उनका पक्ष (बयान) जानना चाह तो उन्होंने जो तर्क दिया, वह हैरान करने वाला है।
तहसीलदार सतीश चंद पाटीदार ने बेबसी जताते हुए कहा: “जिस शौचालय पर ताला लगा हुआ है, वह वर्तमान में जाने की हालत में ही नहीं है। पूरी तरह जर्जर और खराब होने के कारण ही उस पर ताला लटकाया गया है। इसके अलावा एक और छोटा सा नगर पालिका का शौचालय तहसील परिसर में बना हुआ है, लेकिन उसमें गेट (दरवाजा) ही नहीं है, इसलिए वह भी उपयोग करने या जाने की हालत में नहीं है।” नगर पालिका को शौचालय लिए कई बार अवगत भी कराया गया।
तहसीलदार का यह बयान सीधा साबित करता है कि जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात की पूरी जानकारी है कि परिसर के शौचालय बर्बाद हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद महीनों से आम जनता और महिलाओं के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई।

लाखों का ‘अत्याधुनिक शौचालय’ बना पालिका का शो-पीस!
तहसील परिसर के ठीक बगल में नगर पालिका ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए लाखों रुपये जनता की जेब से फूंककर एक ‘अत्याधुनिक सार्वजनिक शौचालय’ खड़ा किया था। आज वह अत्याधुनिक टॉयलेट भ्रष्टाचार और लापरवाही की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। सफाई व्यवस्था शून्य है, पानी की बूंद तक उपलब्ध नहीं है और वहाँ से उठने वाली सड़ांध के कारण पैर रखना भी दूभर है। जनता पूछ रही है कि अगर इसे बंद ही रखना था, तो किसके ठेकेदारों की जेबें भरने के लिए लाखों का बजट ठिकाने लगाया गया था?

आधी आबादी की अस्मिता पर सीधा प्रहार:
पिड़ावा उपखंड क्षेत्र में पिड़ावा तहसील से सैकड़ों ग्रामीण इलाके जुड़े हुए है। यहां सुदूर इलाकों से तपती दुपहरी में यहाँ आने वाली ग्रामीण महिलाओं, बुजुर्गों और किसानों को अपनी बारी के लिए घंटो तक इंतज़ार करना पड़ता है। इस बीच यदि किसी महिला को प्रसाधन की आवश्यकता हो, तो वह कहाँ जाए? अधिकारियों के वीआईपी टॉयलेट के दरवाजे आम जनता के लिए वर्जित हैं। लोक-लाज और मर्यादा को ताक पर रखकर, भारी मन से इन महिलाओं को खुले मैदानों और सूनसान कोनों की तरफ भागना पड़ता है। क्या अफसरों की अंतरात्मा यह देखकर नहीं कचोटती?
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Pirawa Times विशेष: चैंबर के ‘साहबों’ से हमारे तीखे और सीधे सवाल!
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साहब, टॉयलेट खराब था तो सुधारा क्यों नहीं?: तहसीलदार सतीश चंद पाटीदार का यह कहना कि ‘टॉयलेट जाने की हालत में नहीं है’, उनकी जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता बल्कि बढ़ाता है। सवाल यह है कि इसे ठीक कराने के लिए बजट क्यों जारी नहीं हुआ? बिना गेट के शौचालय को वैसे ही क्यों छोड़ दिया गया?
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जनता के पैसों पर ऐश, जनता ही बेबस: जिन किसानों के राजस्व और टैक्स के पैसों से इन अधिकारियों को मोटी तनख्वाहें और गाड़ियाँ मिलती हैं, उन्हें ही इस तरह बेबस छोड़ दिया गया है। यह प्रशासनिक तानाशाही नहीं तो और क्या है?
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कलेक्टर साहब, पिड़ावा की सुध लीजिए: क्या झालावाड़ जिला कलेक्टर इस अमानवीय अव्यवस्था और तहसीलदार के इस तर्क का संज्ञान लेंगे? क्या इस भीषण गर्मी में भटकती जनता के लिए तुरंत नए टॉयलेट या अस्थाई रूप से साफ-सुथरे टॉयलेट की व्यवस्था की जाएगी?






