पिड़ावा। नगर पालिका चुनाव की दहलीज पर खड़ी पिड़ावा कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। नगर कांग्रेस कमेटी की हालिया घोषित कार्यकारिणी ने पार्टी के भीतर उस गुटबाजी को हवा दे दी है जो अब तक दबी हुई थी। जहां नगर अध्यक्ष विरेंद्र कुमार बागवान अपनी नई टीम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं पार्टी के एक धड़े ने इसे ‘बंद कमरे का फैसला’ बताते हुए बगावत का बिगुल फूंक दिया है।
नई कार्यकारिणी और नियुक्तियों का ताना-बाना:
नगर कांग्रेस अध्यक्ष विरेंद्र कुमार बागवान द्वारा जारी सूची में कार्यकर्ताओं को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। कार्यकारिणी में निलेश चेलावत, अजहरुद्दीन खान, जगदीश टेलर, राकेश सुमन, अरशद उल्ला खान, श्याम माली, सुमित जैन, अलफाज बैरागी, रईस मंसूरी, विशाल सोनी, गिरीराज धोबी, सूरज मेहरा, अजीम परवेज मेव, पवन कुमार गुर्जर, इमरान खान, प्रहलाद माली, कैलाश सावंत, पिरूलाल प्रजापति और संजय कुमार जैन जैसे नामों को जगह दी गई है।
असंतोष का विस्फोट: “सक्रिय कार्यकर्ताओं की हुई उपेक्षा”
कार्यकारिणी की घोषणा के अगले दिन ही विरोध के स्वर मुखर हो गए। नाराज कार्यकर्ताओं ने लिखित रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए नगर अध्यक्ष पर आरोप लगाए हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय से जमीन पर पसीना बहाने वाले समर्पित साथियों को किनारे कर दिया गया है। पिरु प्रजापत, दुर्गेश प्रजापत, प्रह्लाद माली, कैलाश सावंत, अबरार अहमद, सूरज मेहर, राहुल ने अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा देते हुए संगठन में नियुक्तियों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।
बिना रायशुमारी के गठन का आरोप:
इस्तीफा देने वाले कार्यकर्ताओं का मुख्य आरोप है कि नगर अध्यक्ष ने कार्यकारिणी के गठन से पहले किसी भी प्रकार की औपचारिक बैठक या पुराने कार्यकर्ताओं से रायशुमारी नहीं की। उनका कहना है कि संगठन में इसी प्रकार मनमाने तरीके से नियुक्तियां होती रहीं, तो आगामी नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कार्यकर्ताओं ने सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व से हस्तक्षेप की मांग की है।


अध्यक्ष का पक्ष: “भेदभाव का सवाल ही नहीं”
इधर, विवादों के बीच नगर कांग्रेस अध्यक्ष वीरेंद्र बागवान ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संगठन में सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि “संगठन की बैठकों की सूचना समय-समय पर सभी को दी जाती है। नियुक्तियों में किसी भी कार्यकर्ता के साथ भेदभाव नहीं किया गया है।
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Pirawa Times विशेष: क्या ‘हाथ’ से छिटक रही है एकता?
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समय का चुनाव: यह घमासान ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी को एकजुट होकर चुनावी मैदान में होना चाहिए था। अपनों की नाराजगी कहीं विरोधियों के लिए रास्ता आसान न कर दे।
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पारदर्शिता की कमी: कार्यकर्ताओं का इस्तीफा देना यह दर्शाता है कि संवादहीनता की स्थिति गहरी है। केवल पदों की घोषणा करना काफी नहीं, बल्कि उन चेहरों को संतुष्ट करना भी जरूरी है जो वर्षों से झंडा उठा रहे हैं।
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नगर पालिका चुनाव पर साया: पिड़ावा की राजनीति में गुटबाजी कांग्रेस के लिए पुरानी समस्या रही है, लेकिन मतदान सूचियों के विवाद और अब संगठन में फूट, पार्टी के लिए दोहरी चुनौती बन गई है।
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समाधान की दरकार: यदि जिला और प्रदेश नेतृत्व ने जल्द ही दोनों गुटों को बिठाकर बीच का रास्ता नहीं निकाला, तो पिड़ावा कांग्रेस में ‘इस्तीफा पॉलिटिक्स’ और भी तेज हो सकती है।






