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खेजरपुर के किसानों का कमाल: खेतों तक पहुँचने के लिए जनसहयोग से बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी ग्रेवल सड़क

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खेतों तक पहुँचने के लिए जनसहयोग से बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी ग्रेवल सड़क
खेतों तक पहुँचने के लिए जनसहयोग से बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी ग्रेवल सड़क

65 ट्रैक्टर ग्रेवल डालकर पेश की मिसाल; ग्रामीणों ने कहा— “सरकार से आस बेकार

रायपुर। “मन में हो विश्वास तो हर मुश्किल आसान हो जाती है”—इस कहावत को रायपुर तहसील क्षेत्र के खेजरपुर गाँव के किसानों ने हकीकत में बदल कर दिखाया है। गाँव के ग्रामीणों और किसानों ने प्रशासनिक उपेक्षा के आगे घुटने टेकने के बजाय जनसहयोग (आपसी चंदे और मेहनत) से खेतों तक जाने वाली मुख्य ग्रेवल सड़क का निर्माण खुद कर डाला है। अन्नदाताओं की इस आत्मनिर्भरता और एकजुटता की गूँज अब पूरे झालावाड़ जिले सहित सीमावर्ती मध्य प्रदेश के इलाकों में भी सुनाई दे रही है।

खेतों तक पहुँचने के लिए जनसहयोग से बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी ग्रेवल सड़क
खेतों तक पहुँचने के लिए जनसहयोग से बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी ग्रेवल सड़क

कीचड़ और दलदल का रास्ता, किसानों की थी बड़ी आफत:

भौगोलिक दृष्टि से खेजरपुर गाँव की सीमा मध्य प्रदेश से सटी हुई है। खेजरपुर क्षेत्र के किसानों की लगभग डेढ़ किलोमीटर और मध्य प्रदेश सीमा के डोंगरगाँव की ओर जाने वाले मार्ग पर करीब 1 किलोमीटर तक की कृषि भूमि आती है। इस मार्ग से क्षेत्र के सैकड़ों किसान प्रतिदिन अपनी सैकड़ों बीघा भूमि पर खेतीबाड़ी के काम से आते-जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी मुसीबत हर साल मानसून के सीजन में खड़ी होती थी। बरसात के दिनों में यह पूरा कच्चा रास्ता अत्यधिक कीचड़ और गहरे दलदल में तब्दील हो जाता था, जिसके कारण किसानों का पैदल निकलना भी दूभर था। ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों के फंसने से बुवाई और कटी हुई फसल को घर लाने में किसानों को भारी यातना झेलनी पड़ती थी।
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65 ट्रैक्टर ग्रेवल डालकर खुद बदली किस्मत:

बार-बार गुहार लगाने के बाद भी जब प्रशासन की तरफ से कोई राहत नहीं मिली, तो खेजरपुर के किसानों ने स्वयं आगे आने का फैसला किया। गाँव में एक आवश्यक बैठक बुलाई गई और जनसहयोग से सड़क बनाने की रणनीति तैयार हुई। इसके बाद तो जैसे पूरा गाँव ही सड़क पर उतर आया। प्रत्येक भूमिधारक किसान ने अपनी क्षमता के अनुसार श्रमदान और आर्थिक सहयोग दिया। ग्रामीणों ने अपनी जेब से पैसा लगाकर लगभग 65 ट्रैक्टर ग्रेवल (मुरम और कंक्रीट) डलवाई और पूरी मेहनत से समतलीकरण कर एक शानदार ग्रेवल सड़क तैयार कर दी।

“अन्नदाता भूखा नहीं सोने देता, तो फिर उसकी अनदेखी क्यों?”:

सड़क निर्माण कार्य पूरा होने के बाद ग्रामीणों और किसानों का दर्द भी छलक उठा। किसानों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि किसान देश का अन्नदाता है, जो दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत कर फसल उत्पादन करता है ताकि देश का कोई भी नागरिक भूखा न सोए। इसी पवित्र भावना के साथ हम सबने मिलकर यह कार्य पूरा किया है। किसानों ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार को कागजी योजनाओं से बाहर निकलकर वास्तव में किसानों के खेतों तक पहुँचने के लिए सुचारू ग्रेवल सड़कें बनानी चाहिए, ताकि खेतीबाड़ी के कार्यों में सुविधा मिल सके।
​इस ऐतिहासिक और प्रेरणादायी कार्य को अमलीजामा पहनाने में ग्रामीण सीताराम दांगी, राधेश्याम दांगी, घनश्याम सुथार, रामप्रसाद दांगी, मुकेश दांगी, कैलाश दांगी, दुर्गालाल दांगी सहित क्षेत्र के अनेक प्रबुद्ध नागरिकों और प्रत्येक भूमिधारक किसान ने अपना विशेष पसीना बहाया।
Pirawa Times विशेष: आत्मनिर्भरता का सलाम या सिस्टम की नाकामी?
  • प्रशंसा के हकदार अन्नदाता: खेजरपुर के किसानों ने जो कर दिखाया, वह यह साबित करता है कि ग्रामीण भारत में आज भी सामूहिक शक्ति और भाईचारा जिंदा है। इन किसानों का जज्बा वाकई सलाम करने योग्य है।
  • लोक निर्माण और पंचायत विभाग पर तमाचा: यह सड़क केवल पत्थरों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक निकम्मेपन पर किसानों के तमाचे की कहानी है। जो काम ग्राम पंचायत और मनरेगा (MGNREGA) के बजट से बरसों पहले हो जाना चाहिए था, उसे किसानों को अपनी जेब से पैसे खर्च कर करना पड़ा।
  • मुआवजा और प्रोत्साहन दे सरकार: जिला कलेक्टर को इस जनसहयोग का संज्ञान लेते हुए इस मार्ग को आगामी जिला योजना में शामिल कर डामरीकरण (पक्की सड़क) की स्वीकृति देनी चाहिए, साथ ही इन जागरूक ग्रामीणों को जिला स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए।

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